शेख हसीना के रहते बांग्लादेश के अल्पसंख्यकों पर होते थे हमले...अब क्या होगा?

बांग्लादेश सोमवार को दोराहे पर खड़ा हो गया. लोकतंत्र के रास्ते से भटक गया. शेख हसीना को हिंसा के कारण इस्तीफा देकर देश छोड़ना पड़ गया. अब नई सरकार तय करेगी कि उसे किस रास्ते जाना है. डगर मुश्किल है, लेकिन जहां चाह वहां राह. हालांकि, बांग्लादेश कट्टरता की तरफ बढ़ता दिख रहा है. शेख हसीना के रहते हुए भी बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों के खिलाफ हिंसा बेहद तेजी से बढ़ गई. 

बांग्लादेश हिंदू बौद्ध ईसाई एकता परिषद (बीएचबीसीयूसी) ने धार्मिक और जातीय अल्पसंख्यकों के खिलाफ हिंसा पर जून 2024 में अपनी वार्षिक रिपोर्ट पेश की थी. इसमें एक वर्ष में मानवाधिकार उल्लंघन के 1,000 से अधिक मामले दर्ज किए गए. करीब 45 अल्पसंख्यकों की मौत भी इस एक साल में हो गई.

बांग्लादेशी अल्पसंख्यक मंच का कहना है कि अपराधियों को न्याय और दंड से छूट कारण बांग्लादेश में जातीय और धार्मिक अल्पसंख्यकों पर लगातार अत्याचार जारी है. बांग्लादेश हिंदू बौद्ध ईसाई एकता परिषद (बीएचबीसीयूसी) की वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार, मुस्लिम बहुल एशियाई देश, बांग्लादेश, में अल्पसंख्यकों के खिलाफ मानवाधिकार उल्लंघन के लगभग 1,045 मामले सामने आए हैं. अंतरधार्मिक फोरम के निष्कर्ष जुलाई 2023 से जून 2024 तक की मीडिया रिपोर्टों पर आधारित हैं. इस अवधि के दौरान अल्पसंख्यक समुदायों के 45 सदस्यों की हत्या कर दी गई,  10 लोगों की हत्या के प्रयास किये गये तथा 36 लोगों को मौत की धमकी दी गई. रिपोर्ट के अनुसार, कुल मिलाकर 479 लोगों पर हमला किया गया. उन्हें शारीरिक रूप से प्रताड़ित किया गया या घायल किया गया, और 11 लोग जबरन वसूली के शिकार बने. हिंसा में 25 सामूहिक बलात्कार शामिल थे, जबकि 12 लोगों का अपहरण किया गया. आठ लोगों को ईशनिंदा के झूठे आरोपों में गिरफ्तार किया गया.

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ईसाई और बौद्ध 1% से भी कम

रिपोर्ट में अल्पसंख्यक समुदायों के घरों और व्यवसायों के खिलाफ 102 हमले, तोड़फोड़, लूटपाट और आगजनी की घटनाएं भी दर्ज की गईं हैं. बांग्लादेश हिंदू बौद्ध ईसाई एकता परिषद के अनुसार, 70-75 प्रतिशत हिंसा भूमि हड़पने पर केंद्रित है, जो अक्सर राजनीतिक दलों के प्रभाव में और सरकारी एजेंसियों की मिलीभगत से होती है. भूमि और वासभूमि अतिक्रमण की 47 घटनाएं और भूमि पर कब्जे, बेदखली गतिविधियों और धमकियों के 45 मामलों तथा 11 धमकियों या निष्कासन के प्रयासों की रिपोर्ट की गई है. 2023 की नवीनतम जनसांख्यकि में पाया गया कि बांग्लादेश की कुल 17 करोड़ की आबादी में से 90 प्रतिशत इस्लाम धर्मानुयायी हैं, हिंदू अभी भी 8 प्रतिशत के साथ सबसे बड़ा अल्पसंख्यक समूह हैं, जबकि ईसाई और बौद्ध 1% से भी कम का प्रतिनिधित्व करते हैं.

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क्यों बढ़ सकती हैं मुश्किलें

ये सब तब हुआ जब बांग्लादेश की सत्ता में शेख हसीना थी. शेख हसीना को भारत का दोस्त माना जाता है. पूर्व प्रधानमंत्री खालिदा जिया की मुख्य विपक्षी पार्टी बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) जब भी बांग्लादेश की सत्ता पर रही है, भारत के साथ बांग्लादेश के रिश्ते बहुत अच्छे नहीं रहे. जिया की बीएनपी को बांग्लादेश की कट्टरपंथी पार्टी मानी जानी वाली बांग्लादेश जमात-ए-इस्लामी का भी समर्थन हासिल है.वह बीएनपी की सरकार में भी शामिल रही है.खालिदा जिया अपनी भारत विरोधी नीतियों के लिए जानी जाती हैं.इस साल अप्रैल में बांग्लादेश में 'इंडिया आउट' और भारतीय उत्पादों के बहिष्कार का मामला भी छाया हुआ था. बीएनपी इस अभियान के साथ नजर आ रहे थीं. भारत के रिश्ते बीएनपी के साथ पिछले कई दशक से सामान्य नहीं चल रहे हैं. इसे उसके भारत विरोधी रुख से जोड़कर देखा जाता है. ऐसी खबरें थीं कि इस साल हुए चुनाव से पहले बीएनपी ने भारत को संदेश भेजा था कि वो अपनी भारत विरोधी नीतियों पर वापस नहीं लौटेगी. लेकिन भारत ने उसकी अपील पर खास ध्यान नहीं दिया था. ऐसे में शेख हसीना का जाना भारत के लिए और बांग्लादेश में रहने वाले अल्पसंख्यकों के लिए बिल्कुल शुभ संकेत नहीं है.

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