इस फ्रेंच फिल्म ने दादा साहब फाल्के में भरा था सिनेमा का जुनून, प्रतिदिन पांच घंटे फिल्म देखने से चली गई थी आंखों की रोशनी
1910 में तब के बंबई के अमरीका-इंडिया पिक्चर पैलेस में ‘द लाइफ ऑफ क्राइस्ट’ दिखाई गई थी। थियेटर में बैठकर फिल्म देख रहे धुंदीराज गोविंद फाल्के ने तालियां पीटते हुए निश्चय किया कि वो भी भारतीय धार्मिक और मिथकीय चरित्रों को रूपहले पर्दे पर जीवंत करेंगे।
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